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Wednesday, 27 September 2017

क्या होता है गुरुत्वाकर्षण तथा गुरुत्वीय त्वरण

क्या होता है गुरुत्वाकर्षण तथा गुरुत्वीय त्वरण

क्या होता है गुरुत्वाकर्षण

न्यूटन के अनुसार इस  ब्रहमाण्ड का प्रत्येक दूसरे पिण्ड को अपनी ओर आकर्षित करता है किन्हीं दो पिण्डो के बीच लगने वाले आकर्षण बल का परिमाण उनके द्रव्यमान के गुणनफलों के समानुपाती और उनकी बीच की दूरी के वर्ग के व्युतक्रमानुपाती होता है और इसकी दिशा दोनो पिण्डो को मिलाने वाली रेखा की सीध में होती है इसे न्यूटन का सर्वव्यापी गुरुत्वाकर्षण का नियम कहते है                                           

क्या दैनिक जीवन में हम गुरुत्वीय त्वरण का अनुभव कर सकते है

दैनिक जीवन में में गुरुत्वाकर्षण बल का अनुभव हम नहीं करते क्योकि इस आकर्षण बल का मान बहुत कम होता है लेकिन आकाशीय ग्रहों और उपग्रहों के बीच गुरुत्वाकर्षण का मान बहुत अधिक होता है इस आकर्षण बल के कारण ही पृथ्वी सूर्य के चारों ओर तथा चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करता है इसी आकर्षण बल के द्वारा ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड में अपनी परिक्रमाएं करते है

गुरुत्वीय त्वरण  क्या है  

यदि आप किसी वस्तु को हवा में उठा कर छोड दें तो वह पृथ्वी के गुरुत्व के कारण नीचे गिरने लगती है गिरने की क्रिया  उसके वेग मे प्रति सेकण्ड बृध्दि होती है वस्तु के वेग में पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण एक सेकण्ड में जितनी बृध्दि होती है वह बृध्दि गुरुत्वी त्वरण कहलाती है इसे ‘g’से प्रदर्शित किया जाता है तथा इसका मान 9.80665 मी. प्रति सेकण्ड होता है

कैसे होता है ‘g’ के मान में परिवर्तन

‘g’ का मान पृथ्वी के भूमध्य रेखा पर न्यूनतम होता है इसका मान धुव्रों पर सबसे अधिक होता है पृथ्वी की सतह से ऊपर या नीचे की ओर जाने पर ‘g’ का मान घटता है पृथ्वी की घूर्णन गति बढने पर गुरुत्वी त्वरण का मान कम हो जाता है तथा घूर्णन गति घटने पर गुरुत्वी त्वरण का मान बढ जाता है पृथ्वी के केंद्र पर ‘g ‘  का मान शून्य होता है और पृथ्वी के केंद्र पर किसी भी वस्तु का भार शून्य हो जायेगा यदि पृथ्वी अपनी वर्तमान कोणीय चाल की 17 गुनी अधिक चाल से घूमने लगे तो भूमध्य रेखा पर रखी वस्तु का भार भी शून्य हो जायेगा

भार किसे कहते है

जिस बल द्वारा पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केंद्र की ओर खीचती है वो उस वस्तु का भार कहलाता है चंद्रमा पर किसी पिण्ड का भार पृथ्वी पर उसके भार से 1/6 गुना होता है और पृथ्वी का द्रव्यमान चंद्रमा के द्रव्यमान से 81 गुना अधिक है

क्या  लिफ्ट में पिण्ड का भार

1. जब लिफ्ट त्वरण ‘a’ के साथ ऊपर की ओर जाती है तो लिफ्ट में स्थित पिण्ड का भार बढा हुआ प्रतीत होता है

2. जब लिफ्ट त्वरण ‘a’ के साथ नीचे की ओर आती है तो लिफ्ट में स्थित पिण्ड का भार घटा हुआ प्रतीत होता है

3. जब लिफ्ट एक समान वेग से ऊपर या नीचे जाती है तो लिफ्ट में स्थित पिण्ड के भार में कोई परिवर्तन प्रतीत नहीं होता तथा

4. जब नीचे उतरते समय लिफ्ट की डोरी टूट जाये तो वह मुक्त पिण्ड की भांति नीचे गिरती है अर्थात पिण्ड का भार शून्य होता है यही भार हीनता की स्थिति है यदि लिफ्ट के नीचे गिरते समय लिफ्ट का त्वरण गुरुत्वीय त्वरण से अधिक हो जाये तो लिफ्ट में स्थित पिण्ड फर्श से उठ कर उसकी छत से टकरा जायेगा

 

 

गुरुत्व केंद्र व संतुलन

गुरुत्व केंद्रसंतुलन

क्या है गुरुत्व केंद्र

किसी वस्तु का गुरुत्व केंद्र वह बिंदु है चाहे वस्तु किसी भी स्थिति में रखी जाये उस पर वस्तु का समस्त भार कार्य करता है

 

क्या है संतुलन

वस्तु का भार गुरुत्व केंद्र से ठीक नीचे की ओर कार्य करता है अत: गुरुत्व केंद्र पर वस्तु के भार के बराबर ऊपरी बल लगाकर हम वस्तु को संतुलित कर सकते है, जब किसी वस्तु पर कई बल इस प्रकार लगा रहे हो कि वस्तु ना तो रेखीय गति ना ही घूर्णन गति करे तो वस्तु संतुलन की अवस्था मे कहलाती है

 

कोई वस्तु कब तक संतुलन में रह सकती है

कोई भी वस्तु उस समय तक संतुलन की अवस्था में रह सकती है जब तक उसके गुरुत्व केंद्र से होकर जाने वाली उर्ध्वाधर रेखा उस वस्तु के आधार के क्षेत्रफल के अंदर से होकर गुजरती है, यदि यह रेखा आधार के क्षेत्रफल के बाहर हो जाती है तो वस्तु का संतुलन बिगड जाता है और गिर पडती है इसलिए वस्तु के आधार का क्षेत्रफल जितना बडा होगा उस वस्तु का संतुलन उतना ही अधिक स्थाई होगा

संतुलन का उदाहरण

1.  पीसा की मीनार झुकी होने पर भी आज तक खडी हुई है इसका कारण यह है कि इसके केंद्र से जाने वाली उर्ध्वाधर रेखा इसके आधार से होकर गुजरती है जब इस मीनार का झुकाब इतना अधिक हो जायेगा कि गुरुत्व केंद्र से होकर गुजरने वाली उर्ध्वाधर रेखा आधारके बाहरहोकर गुजरने लगेगी तो ये मीनार गिर जायेगी

2. जब हम पानी से भरी बाल्टी अपने दाएं हाथ में लेकर चलते है तो बाएं हाथ की तरफ झुक जाते है वास्तव में ऐसा हम इसलिए करते है क्योकि हमारे गुरुत्व केंद्र से होकर जाने वाली उर्ध्वाधर रेखा हमारे पैरो के बीच में होती है
संतुलन कितने प्रकार का होता है

संतुलन तीन प्रकार के होते है, स्थाई संतुलन, अस्थाई संतुलन, उदासीन संतुलन

1. स्थाई संतुलनयदि किसी वस्तु को संतुलन स्थिति से थोडा विस्थापित किया जाये और छोडते ही वह पूर्व स्थिति में आ जाये तो वह स्थाई संतुलन कहलाता है जैसे-अपने आधार पर रखा शंकु

2. अस्थाई संतुलनयदि किसी वस्तु कि संतुलन स्थिति से थोडा विस्थापित किया जाये और छोड देने पर वह पूर्व स्थिति में ना आये तो वह अस्थाई संतुलन कहलाता है जैसे- अपने शीर्ष पर रखा हुआ शंकु यदि उसको थोडा सा हिलाया जायेगा तो उसका संतुलन बिगड जायेगा और वह गिर पडेगा

3. उदासीन संतुलन- यदि किसी वस्तु को संतुलन की स्थिति से थोडा सा विस्थापित किया जाये और छोड देने पर वस्तु अपनी नई स्थिति मे संतुलित हो जाये तो उदासीन संतुलन कहलाता है जैसे-तिरछे फलक के सहारे शंकु, गेंद, बेलन इत्यादि

 

ऊर्जा - भौतिक विज्ञान

ऊर्जा - भौतिक विज्ञान

ऊर्जा क्या है?

किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता को उसकी "ऊर्जा" कहते है उदाहरण के लिए बंदूक से छोडी गयी गयी गोली लक्ष्य से टकराकर विस्थापन उत्पन करती है, कार्य की भाँति ही ऊर्जा एक अदिश राशि है और इसका मात्रक जूल है

यांत्रिक ऊर्जा-
जब कोई वस्तु किसी अन्य वस्तु पर कार्य करती है तो कार्य करने वाली वस्तु की ऊर्जा खर्च होती है और जिस पर कार्य किया जाता है उस की ऊर्जा बढ जाती है किया गया कार्य स्थानांतरित ऊर्जा तथा कार्य द्वारा प्राप्त यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है

गतिज ऊर्जा तथा स्थितिक ऊर्जा

गतिज ऊर्जा-
किसी वस्तु में उसकी गति के कारण जो ऊर्जा आती है उसे गतिज ऊर्जा कहते है जैसे-गोली में उसकी गति के कारण होती है

गतिज ऊर्जा सदैव घनात्मक होती है जैसे बंदूक से छोडी गयी गोली,धनुष से छोडा गया तीर, गतिमान हथौडा, गिरती हुई वर्षा की बूँदे, आदि गतिज ऊर्जा के उदाहरण है

स्थितिज ऊर्जा-
जब किसी वस्तु में विशेष अवस्था के कारण कार्य करने की क्षमता आ जाती है तो वह स्थितिज ऊर्जा कहलाती है जैसे- बाँध में ऊँचाई पर जल एकत्रित किया जाता है जिसे स्थितिज ऊर्जा आ जाती है और जब यह जल नीचे टरबाइन पर गिराया जाता है तो यहा ऊर्जा टरबाइन के पहिए को घुमाती  है और विधुत उत्पन्न होती है प्रकार बाँध की ऊँचाई पर स्थितिज ऊर्जा विधुत ऊर्जा में बदल जाती है

किसी भी वस्तु में स्थितिज ऊर्जा निम्न रूपों में निहित होती है जो इस प्रकार है जैसे गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा जब भारी हथौडे को ऊँचाई से गिराया जाये तो हथौडे में कार्य करने की जो क्षमता आती है वो उसकी पृथ्वी तल से ऊँचाई के कारण आती है

प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा-
जब घडी में चाबी भर दी जाती है तो घडी के भीतर स्प्रिंग दब जाती है और वह तनाव में आ कर एक विशेष अवस्था के कारण उस में ऊर्जा आ जाती है

स्थिर विधुत स्थितिज ऊर्जा-
विधुत आवेश जो होते है वह एक दूसरे के प्रति आकर्षित व प्रतिकर्षित होते रहते है और आवेशों के निकाय में भी स्थितिज ऊर्जा होती है जिसे स्थिर विधुत स्थितिज ऊर्जा कहते है

चुम्बकीय स्थितिज ऊर्जा-
चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित किसी गतिमान आवेश तथा धारावाही चालक पर लगने वाले चुम्बकीय बल के कारण उसमें जो कार्य करने की क्षमता उत्पन हो जाती है उसे चुम्बकीय स्थितिज ऊर्जा कहते है

रासायनिक ऊर्जा-
विभिन्न प्रकार के ईधनो में स्थितिज ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित रहती है जैसे- कोयले, पेट्रोल, मिट्टी का तेल इत्यादि जब इन्हें जलाया जाता है तब यह रासायनिक ऊर्जा ऊष्मीय ऊर्जा व प्रकाश ऊर्जा में बदल जाती है

ऊर्जा संरक्षण का सिध्दांत
ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और ना ही नष्ट किया जा सकता है केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है

ऊर्जा रूपांतरित करने वाले उपकरण-

1. डायनमो यांत्रिक ऊर्जा को विधुत ऊर्जा में परिवर्तित करता है,

2. विधुत मोटर विधुत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करती है,

3. माइक्रो फोन ध्वनि ऊर्जा को विधुत ऊर्जा में,

4. लाउडस्पीकर विधुत ऊर्जा को ध्वनि ऊर्जा में

न्यूटन के गति विषयक नियम

न्यूटन के गति विषयक नियम

प्रथम नियम(जड्त्व का नियम)

- जडत्व का नियम- यदि किसी वस्तु पर या पिंड स्थिर है या एक निश्चित गति कर रहा है, इसकी अवस्था मे तभी परिवर्तन होगा जब इस पर कोई बाह्य बल लगाया जाये, अर्थात जब कोई पिंड स्थिर है तो तब तक स्थिर ही रहेगा जब तक कोई बाह्य बल ना लगे, तथा यदि गति में है तो तब तक रहेगा जब तक बाह्य बल ना लगे  ,इसके उदाहरण है,

- बस का अचानक ब्रेक लगाने पर आगे की ओर झट्का लगता है

- स्थिर बस के एकाएक आगे चल पड्ने से यात्रियों को पीछे की ओर झट्का लगता है

- चटाई या कालीन को डंडे से पीटने पर उसमें से धूल निकलती है

- यदि खिड्की के कांच मे गोली मारी जाये तो उसमें गोल छेद हो जाता है

- हथौडे के हथ्थे को मजबूती से फसाने के लिये उसे ज़मीन पर ठोका जाता है

- एक्समान चाल से चलती हुई रेलगाडी में ऊपर उछाली गयी गेंद उछालने वाले के हाथ में वापस आ जाती है

दूसरा नियम(संवेग परिवर्तन का नियम)

- संवेग परिवर्तन का नियम-  संवेग परिवर्तन की दर पिण्ड पर बल के समानुपाती तथा बल की दिशा में होती है

तीसरा नियम(क्रिया प्रतिक्रिया का नियम)

- तीसरा नियम- इस नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के फलस्वरूप समान और विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है, यदि कोई वस्तु किसी अन्य वस्तु पर बल लगाती है तो वह वस्तु भी पहली वस्तु पर विपरीत दिशा में बल लगाती है, इन दोनो बलों में से लगने वाले बल को क्रिया तथा दूसरे बल को प्रतिक्रिया कहा जाता है क्रिया प्रतिक्रिया के अनेक उदाहरण है,

- बंदूक से गोली निकलने पर, पीछे को धक्का लगता है

- राकेट मे रखे ईधन के जलने से उतपन्न गैसें तीव्र गति से पीछे की ओर निष्काषित होती हैं तथा इसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप राकेट ऊपर की ओर गति करता है

- नदी के किनारे पर व्यक्ति द्वारा नाव को पीछे की ओर दबाने पर नाव, व्यक्ति को आगे की ओर फेंकती है

 

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